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हीरानन्दजी महाराज
श्री श्री १००८ महाराज
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Posted by
yogesh singh rajpurohit [talkiya / तालकिया]
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यहाँ इस भवन के संथापक संत श्री हीरानन्दजी महाराज का जीवन परिचय करवाना मै उचित समझता हूँ | उनका जीवन परिचय आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक का काम करेगा | युवा वर्ग को समाज के प्रति समर्पण हेतु प्रेरणा मिलेगी | ऐसी आशा करता हूँ | संत को नमन !
श्री हीरानंदजी का जन्म चम्पाखेड़ी तहसील मेड़ता जिला नागौर जागरवाल वंशीय राजपुरोहित श्री रामजी के यहाँ वि.सं. 1953 में हुआ | माता का नाम सरदार बाई था | कुन्तलसर जिला चुरू की जन्मी जायी | ये 15 साल तक गाँव में रहे | शिक्षा अक्षर ज्ञान तक | वि.सं. 1967 में पिता के साथ गुलवर्गा (महाराष्ट्र) गये जहा निजी दालमिल में काम किया | वि.सं. 1970 पुन: गाँव आये | यहाँ रतनपुरा निवासी श्री जगन्नाथजी की पुत्री राजा बाई के साथ शादी | तीन साल बाद सपत्निक पुन: गुलवर्गा गये | 1984 को पुन: गाँव आये | मकान का निर्माण व आपके दो पुत्र व एक पुत्री का जन्म हुआ | दुर्भाग्यवंश जीवित एक भी नहीं रहा | वि.सं. 1992 में माता का व 1995 वि.सं. में पिताजी का छाया उठ गया | गुलवर्गा का धंधा बंद गाँव में स्थायी निवास |
इनको भ्रमण का शौक था | भ्रमण के समय कुछ ज्ञानियों, सन्यासियो का मिलन व संतान विहीन होने से वैराग्य भावना से प्रेरित होकर पालासनी जिला जोधपुर के संत श्री सेवानंदजी के शिष्य हीरानान्दजी वि.सं. 2009 में साधू बन गये | संतो के साथ विचरण | मगर समाज यानी जाति समाज में रूचि रखते थे | कही पर आयोजन ओसर-मोसर में शरीक होते रहते | इसी क्रम में धांधलास ब्रह्राभोज में पदापर्ण व उस वक्त पुष्कर तीर्थ पर भवन विक्रय की बात चली व 2011 में आपने इस कार्य में पूरा समर्थन किया | अपनी सेवाएं समाज को समर्पित कर दी | यही नहीं जागीर अधिग्रहण में भूमि का जो मुआवजा मिला वह भी प्रस्तावित भवन के निमित खर्च कर दिया |
संस्थान के लिए प्रेरक श्री हीरानंदजी ने खुद को समाज का सेवक माना | कभी भी नाम की आकांक्षा नहीं की | जब भवन का क्रय किया गया तो उनमे संतश्री के नाम का उल्लेख किया गया | मगर संतजी ने स्पष्ट मना कर दिया | क्रय विलेख पत्र में 05.01.1956 को जिन समाज के प्रभुजनों का उल्लेख था वो पूर्वज प्रकाशित पुस्तक में आ गया है |
नि:संदेह ये समाज के सेवक इस भवन की नींव के पत्थर माने जायेंगे | समाज उनका कृतज्ञी रहेगा | श्रद्धेय श्री हीरानंदजी ने अपना अस्तित्व संस्था के विकास में विलीन कर दिया | दिनाक 23.04.1961 तक सप्तदिवसीय श्री मद्भागवत कथा का प्रवचन महायज्ञ समापन कराया |
आपका स्वर्गवास श्रावण वद 13 वि.सं. 2033 को हो गया | आपने अपना नाम समाज के हर नागरिक के दिल में बैठा दिया | समाज ने उनकी एक प्रस्तर मूर्ति का निर्माण करवाकर भवन में ही 04.10.1984 को स्थागित कर दिया | प्रतिवर्ष इनको समाज श्रद्धासुमन अर्पित करता है |
आपकी मूर्ति जो भवन में प्रतिष्टित है उनके सामने 21 चाँदी के सिक्के संगमरमर में फिट किये हुए है | यह भी एक आपकी निधि है |
यहाँ इस भवन के संथापक संत श्री हीरानन्दजी महाराज का जीवन परिचय करवाना मै उचित समझता हूँ | उनका जीवन परिचय आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक का काम करेगा | युवा वर्ग को समाज के प्रति समर्पण हेतु प्रेरणा मिलेगी | ऐसी आशा करता हूँ | संत को नमन !
श्री हीरानंदजी का जन्म चम्पाखेड़ी तहसील मेड़ता जिला नागौर जागरवाल वंशीय राजपुरोहित श्री रामजी के यहाँ वि.सं. 1953 में हुआ | माता का नाम सरदार बाई था | कुन्तलसर जिला चुरू की जन्मी जायी | ये 15 साल तक गाँव में रहे | शिक्षा अक्षर ज्ञान तक | वि.सं. 1967 में पिता के साथ गुलवर्गा (महाराष्ट्र) गये जहा निजी दालमिल में काम किया | वि.सं. 1970 पुन: गाँव आये | यहाँ रतनपुरा निवासी श्री जगन्नाथजी की पुत्री राजा बाई के साथ शादी | तीन साल बाद सपत्निक पुन: गुलवर्गा गये | 1984 को पुन: गाँव आये | मकान का निर्माण व आपके दो पुत्र व एक पुत्री का जन्म हुआ | दुर्भाग्यवंश जीवित एक भी नहीं रहा | वि.सं. 1992 में माता का व 1995 वि.सं. में पिताजी का छाया उठ गया | गुलवर्गा का धंधा बंद गाँव में स्थायी निवास |
इनको भ्रमण का शौक था | भ्रमण के समय कुछ ज्ञानियों, सन्यासियो का मिलन व संतान विहीन होने से वैराग्य भावना से प्रेरित होकर पालासनी जिला जोधपुर के संत श्री सेवानंदजी के शिष्य हीरानान्दजी वि.सं. 2009 में साधू बन गये | संतो के साथ विचरण | मगर समाज यानी जाति समाज में रूचि रखते थे | कही पर आयोजन ओसर-मोसर में शरीक होते रहते | इसी क्रम में धांधलास ब्रह्राभोज में पदापर्ण व उस वक्त पुष्कर तीर्थ पर भवन विक्रय की बात चली व 2011 में आपने इस कार्य में पूरा समर्थन किया | अपनी सेवाएं समाज को समर्पित कर दी | यही नहीं जागीर अधिग्रहण में भूमि का जो मुआवजा मिला वह भी प्रस्तावित भवन के निमित खर्च कर दिया |
संस्थान के लिए प्रेरक श्री हीरानंदजी ने खुद को समाज का सेवक माना | कभी भी नाम की आकांक्षा नहीं की | जब भवन का क्रय किया गया तो उनमे संतश्री के नाम का उल्लेख किया गया | मगर संतजी ने स्पष्ट मना कर दिया | क्रय विलेख पत्र में 05.01.1956 को जिन समाज के प्रभुजनों का उल्लेख था वो पूर्वज प्रकाशित पुस्तक में आ गया है |
नि:संदेह ये समाज के सेवक इस भवन की नींव के पत्थर माने जायेंगे | समाज उनका कृतज्ञी रहेगा | श्रद्धेय श्री हीरानंदजी ने अपना अस्तित्व संस्था के विकास में विलीन कर दिया | दिनाक 23.04.1961 तक सप्तदिवसीय श्री मद्भागवत कथा का प्रवचन महायज्ञ समापन कराया |
आपका स्वर्गवास श्रावण वद 13 वि.सं. 2033 को हो गया | आपने अपना नाम समाज के हर नागरिक के दिल में बैठा दिया | समाज ने उनकी एक प्रस्तर मूर्ति का निर्माण करवाकर भवन में ही 04.10.1984 को स्थागित कर दिया | प्रतिवर्ष इनको समाज श्रद्धासुमन अर्पित करता है |
आपकी मूर्ति जो भवन में प्रतिष्टित है उनके सामने 21 चाँदी के सिक्के संगमरमर में फिट किये हुए है | यह भी एक आपकी निधि है |
यहाँ इस भवन के संथापक संत श्री हीरानन्दजी महाराज का जीवन परिचय करवाना मै उचित समझता हूँ | उनका जीवन परिचय आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक का काम करेगा | युवा वर्ग को समाज के प्रति समर्पण हेतु प्रेरणा मिलेगी | ऐसी आशा करता हूँ | संत को नमन !
श्री हीरानंदजी का जन्म चम्पाखेड़ी तहसील मेड़ता जिला नागौर जागरवाल वंशीय राजपुरोहित श्री रामजी के यहाँ वि.सं. 1953 में हुआ | माता का नाम सरदार बाई था | कुन्तलसर जिला चुरू की जन्मी जायी | ये 15 साल तक गाँव में रहे | शिक्षा अक्षर ज्ञान तक | वि.सं. 1967 में पिता के साथ गुलवर्गा (महाराष्ट्र) गये जहा निजी दालमिल में काम किया | वि.सं. 1970 पुन: गाँव आये | यहाँ रतनपुरा निवासी श्री जगन्नाथजी की पुत्री राजा बाई के साथ शादी | तीन साल बाद सपत्निक पुन: गुलवर्गा गये | 1984 को पुन: गाँव आये | मकान का निर्माण व आपके दो पुत्र व एक पुत्री का जन्म हुआ | दुर्भाग्यवंश जीवित एक भी नहीं रहा | वि.सं. 1992 में माता का व 1995 वि.सं. में पिताजी का छाया उठ गया | गुलवर्गा का धंधा बंद गाँव में स्थायी निवास |
इनको भ्रमण का शौक था | भ्रमण के समय कुछ ज्ञानियों, सन्यासियो का मिलन व संतान विहीन होने से वैराग्य भावना से प्रेरित होकर पालासनी जिला जोधपुर के संत श्री सेवानंदजी के शिष्य हीरानान्दजी वि.सं. 2009 में साधू बन गये | संतो के साथ विचरण | मगर समाज यानी जाति समाज में रूचि रखते थे | कही पर आयोजन ओसर-मोसर में शरीक होते रहते | इसी क्रम में धांधलास ब्रह्राभोज में पदापर्ण व उस वक्त पुष्कर तीर्थ पर भवन विक्रय की बात चली व 2011 में आपने इस कार्य में पूरा समर्थन किया | अपनी सेवाएं समाज को समर्पित कर दी | यही नहीं जागीर अधिग्रहण में भूमि का जो मुआवजा मिला वह भी प्रस्तावित भवन के निमित खर्च कर दिया |
संस्थान के लिए प्रेरक श्री हीरानंदजी ने खुद को समाज का सेवक माना | कभी भी नाम की आकांक्षा नहीं की | जब भवन का क्रय किया गया तो उनमे संतश्री के नाम का उल्लेख किया गया | मगर संतजी ने स्पष्ट मना कर दिया | क्रय विलेख पत्र में 05.01.1956 को जिन समाज के प्रभुजनों का उल्लेख था वो पूर्वज प्रकाशित पुस्तक में आ गया है |
नि:संदेह ये समाज के सेवक इस भवन की नींव के पत्थर माने जायेंगे | समाज उनका कृतज्ञी रहेगा | श्रद्धेय श्री हीरानंदजी ने अपना अस्तित्व संस्था के विकास में विलीन कर दिया | दिनाक 23.04.1961 तक सप्तदिवसीय श्री मद्भागवत कथा का प्रवचन महायज्ञ समापन कराया |
आपका स्वर्गवास श्रावण वद 13 वि.सं. 2033 को हो गया | आपने अपना नाम समाज के हर नागरिक के दिल में बैठा दिया | समाज ने उनकी एक प्रस्तर मूर्ति का निर्माण करवाकर भवन में ही 04.10.1984 को स्थागित कर दिया | प्रतिवर्ष इनको समाज श्रद्धासुमन अर्पित करता है |
आपकी मूर्ति जो भवन में प्रतिष्टित है उनके सामने 21 चाँदी के सिक्के संगमरमर में फिट किये हुए है | यह भी एक आपकी निधि है |
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