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कौन थे भोपालसिंह राजपुरोहित?
🚩 जब एक राजपुरोहित नादिरशाह के सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया
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Posted by
yogesh singh rajpurohit [talkiya / तालकिया]
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सेनापति भोपालसिंह राजपुरोहित – उमरकोट के भूले-बिसरे वीर ⚔️
"कलम और तलवार के धनी – राजपुरोहित नाम, शौर्य की पहचान"
कौन थे भोपालसिंह राजपुरोहित?
1736 ई. में जब फारस का नादिरशाह भारत की तरफ बढ़ा, तब सिंध के उमरकोट किले की रक्षा का भार जिनके कंधों पर था – वो थे **सेनापति भोपालसिंह राजपुरोहित**।
ये सोढा वंश के राणा मेगराज के राजपुरोहित, दीवान और प्रधान सेनापति थे। भोपालसिंह राजपुरोहित ।
1736 – नादिरशाह के सामने दीवार बनकर खड़े हुए
नादिरशाह के डर से सिंध का सूबेदार नूर मुहम्मद कल्होड़ो भागकर उमरकोट आया। सोढा राणा मेगराज ने उसे शरण दी। इसी वजह से नादिरशाह ने उमरकोट पर आक्रमण किया ।
पर किले की असली कमान संभाली राजपुरोहित भोपालसिंह ने।
ख्यात कहती है:
"नादर साह री फौज आई जद पुरोहित जी तलवार लेय'र आगे हुया।
जद लग जूझ्या नी, किले रो दरवाजो नी खुल्यो।"⚔️⚔️
नादिरशाह की विशाल फौज के सामने सीधी टक्कर नहीं ली। छापामार युद्ध किया। मरुस्थल का चप्पा-चप्पा जानते थे। नादिरशाह की रसद काटी, रात में हमले किए, किले को बचाया और राणा के परिवार को सुरक्षित पहले ही गढ़ के गुप्त रास्ते से बाहर निकाल दिया ।और आप दिवार बनकर खड़े हो गये नादिरशाह के सामने ओर जब तक अपने प्राणों की आहुति नहीं दी तब तक लड़ते रहे।
ये सब हमें क्यों नहीं पढ़ाया जाता इतिहास में?
क्योंकि
1. नादिरशाह का 1739 का दिल्ली कत्लेआम तो सब जानते हैं, पर 1736 का सिंध-उमरकोट संघर्ष "छोटा" मानकर भुला दिया गया।
2. ख्यात में दर्ज, किताब में नहीं – इनकी वीरता "उमरकोट री ख्यात" और "बही-भाट की पोथियों" में दर्ज है। सरकारी दस्तावेज में लिखा
– "राणा लड़ा", पर लड़ने वाले राजपुरोहित थे। राजपुरोहित क्यों लड़ते थे?
उमरकोट के सोढा राजाओं के राजपुरोहित सिर्फ पूजा-पाठ नहीं करते थे। वे थे ।
1. दीवान – राज्य का प्रशासन संभालना
2. सेनापति – युद्ध का नेतृत्व करना
3. शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता – वेद भी जानते थे, तलवार भी चलाते थे
"शरणागत-रक्षा" राजपूत धर्म था। 1542 में राणा प्रसाद ने हुमायूँ को शरण दी थी। 1736 में राणा मेगराज और भोपालसिंह ने वही धर्म निभाया।
आज कहाँ हैं उनके वंशज?
विभाजन के बाद उमरकोट के सोढा राणा और उनके राजपुरोहित परिवार बाड़मेर-जैसलमेर आ गए। आज भी "सोढा राजपुरोहित" सरनेम वाले परिवारों की बही में 1736 के "शहीद भोपालसिंह जी" का नाम दर्ज है।
उमरकोट का किला आज पाकिस्तान में है, पर उसकी दीवारें आज भी गवाही देती हैं – यहाँ राजपुरोहित भी राणा के साथ मर-मिटे थे।और शरणागत वत्सल भाव को निभाते हुए अनेकों राजपुरोहितों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था।
"इतिहास वही नहीं जो किताबों में लिखा है,
इतिहास वो भी है जो ख्यातों में गाया जाता है।"
ओर हमारे पूर्वज हमारी नानी दादी हमें बचपन सुनाती थी। वो भी इतिहास का एक हिस्सा है। लेकिन उस वक्त के लेखक या कवि केवल दरबार तक ही सीमित थे क्योंकि वहीं से उनका गुज़ारा चलता था ओर इनाम के तौर पर मोटे मोटे उपहार मिलते थे। इसलिए उन लोगों ने केवल राजपरिवार का ही गुणगान किया है। लेकिन जो लोग उस वक्त मोजूद थे जिन्होंने आंखों देखी अपने बेटे बेटियों को सुनाई, उन्होंने आगे अपने बेटे बेटियों को सुनाई ओर उन्होंने आगे से आगे अपने बेटे बेटियों को सुनाई इस प्रकार निरंतर ये कड़ी चलती आ रही है।ओर आगे भी चलती रहेगी।
मेरी आप सबसे विनम्र अपील है कि आप सेनापति भोपालसिंह राजपुरोहित की वीरता का बखान हर एक नौजवान ओर पढ़ने वाले बच्चों तक पहुंचाएं ताकि उन्हें मालूम चले कि हमारे पूर्वज केसे थे।
तथा पौराणिक काल में घटित घटनाओं और योद्धाओं के बारे में जानने के लिए अपने भाई नायक सूरज राजस्थान को फौलो भी करें धन्यवाद 🫡
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