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जगत पिता श्री ब्रम्हा जी
ब्रम्हा जी
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Posted by
yogesh singh rajpurohit [talkiya / तालकिया]
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जगत पिता श्री ब्रह्राजी
भगवान विष्णु की नाभि रचना से प्रकट सर्वप्रथम ब्रह्राजी को स्रष्टि की रचना हेतु आदेश मिला | इस पर ब्रह्राजी ने एक कमल के पुष्प से प्रहार करके राक्षसों का नाश किया और जिस स्थान पर वह पुष्प गिरा वहा तीन सुन्दर सरोवर बने जिसे हम पुष्कर के नाम से जानते है | कार्तिक नक्षत्र की महिमा को जानकार सर्व देवताओ, ऋषियों तथा मुनियों को पुष्कर में आमंत्रित किया गया | ब्रह्राजी ने यज्ञ शुरू करने से पूर्व अपनी धर्मपत्नी सावित्री को बुलाने के लिए नारद को भेजा |
नारद ने सावित्री माता को आने का कारण बताया लेकिन सावित्री माता सुसज्जित होने में व्यस्त थी इस पर सावित्री माता ने कहा नारद तुम जाओ मै अपनी सहेलियों के साथ आ रही हूँ | इतना सुनकर नारदजी वहा से लौट आये और ब्रह्राजी से कहने लगे कि सावित्री माता ने कहा है कि मेरे बिना यज्ञ का शुभारम्भ नहीं हो सकता इतना सुन देवताओ ने यज्ञ का शुभ समय निकलने को देखते हुए एक गुर्जर कन्या को यज्ञ में बैठने का निर्णय लिया | जिसे आप इस गायत्री माँ के नाम से जानते है परन्तु जब वहा सावित्री माँ ने देखा कि यज्ञ में मेरे स्थान पर कोई और स्त्री बैठी है, तो अत्यंत क्रोधित हुई और बोली हे ब्रह्रादेव पृथ्वीलोक में यदि कोई भी मनुष्य आपका मंदिर बनवायेगा तत्पश्चात उसकी मृत्यु हो जाएगी | ब्रह्रादेव आपको अपना मंदिर बनवाने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेना होगा |
इतना कहकर सावित्री स्वयं दूर एक पहाड़ी पर जाकर स्थाई रूप से विराजमान हो गई | स्रष्ठी के रचनाकार ब्रह्रा के ही वंश में ऋषि कश्यप, ऋषि शांडिल्य, ऋषि पिपलाद, ऋषि पाराशर और ऋषि उदालक इन ऋषियों के ही वंशज राजपुरोहित चुने गए | वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिता: ब्रह्रा समाज के उत्थान के लिए स्वयं ब्रह्राजी ने खेताराम के रूप में उदेशिय वंश राजपुरोहित परिवार में जन्म लिया |
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