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Varkana / वरकाणा

Varkana / वरकाणा

Welcome to Varkana / वरकाणा Village

About the Village

बरकाना, जिसे आज वरकाना (Varkana/Warkana) के नाम से अधिक जाना जाता है, का इतिहास मध्यकालीन मेवाड़ और मारवाड़ के बदलते राजनीतिक परिदृश्य से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह गाँव गोडवाड़ क्षेत्र में स्थित है, जो प्राचीन काल से ही सामरिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। प्रारंभिक समय में बरकाना मेवाड़ के सिसोदिया शासकों के प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण में था।

बरकाना जागीर की स्थापना

बरकाना की जागीर की औपचारिक स्थापना महाराणा मोकल (1421–1433 ई.) के शासनकाल में हुई। अपने विश्वस्त सेवकों को सम्मानित करने तथा सीमांत क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महाराणा मोकल ने 1423 से 1433 ई. के मध्य सेलरवाल राजपुरोहित सुल्तान सिंह को बरकाना में भूमि प्रदान की। यही वह ऐतिहासिक क्षण था, जिसने इस क्षेत्र में राजपुरोहितों की एक प्रतिष्ठित धार्मिक एवं प्रशासनिक परंपरा की नींव रखी।

स्थापत्य धरोहर : वरकाना जैन मंदिर

महाराणा मोकल के उत्तराधिकारी महाराणा कुम्भा के शासनकाल में मेवाड़ कला, संस्कृति और स्थापत्य के स्वर्ण युग में प्रवेश कर गया। इसी काल, लगभग 1428 ई. से भगवान पार्श्वनाथ, जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर, को समर्पित प्रसिद्ध वरकाना जैन मंदिर का निर्माण प्रारम्भ हुआ।

यह भव्य मंदिर एक ही समय में निर्मित नहीं हुआ, बल्कि कई पीढ़ियों के प्रयासों से विकसित हुआ। समय-समय पर इसके विस्तार एवं जीर्णोद्धार का कार्य चलता रहा और 1652 ई. तक इसकी प्रमुख स्थापत्य संरचना पूर्ण रूप से विकसित हो चुकी थी। आज यह मंदिर गोडवाड़ क्षेत्र के पंच तीर्थों में से एक माना जाता है तथा मध्यकालीन मेवाड़ की धार्मिक सहिष्णुता और संरक्षण की उत्कृष्ट मिसाल प्रस्तुत करता है।

भोमिचारा व्यवस्था एवं घाणेराव से संबंध

समय के साथ बरकाना "भोम की जागीर" के रूप में विकसित हुआ। भोम व्यवस्था ऐसी पारंपरिक भूमि व्यवस्था थी, जिसमें स्थानीय भू-स्वामियों (भोमिया) को अपने पैतृक अधिकार बनाए रखने के बदले क्षेत्र की सुरक्षा, सैन्य सहायता और प्रशासनिक सहयोग का दायित्व निभाना पड़ता था।

इस जागीर का प्रशासन सेलरवाल राजपुरोहित परिवार तथा राठौड़ों की चंपावत शाखा के राजपूत ठिकानेदारों द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया जाता था। दोनों समुदायों ने मिलकर गाँव की सामाजिक, धार्मिक एवं प्रशासनिक परंपराओं का संरक्षण किया।

इसी ऐतिहासिक व्यवस्था के कारण आज भी बरकाना में होलिका दहन की दो परंपराएँ विद्यमान हैं—

  1. समस्त ग्रामवासियों की सामूहिक होलिका दहन।

  2. सेलरवाल राजपुरोहित समाज की पारंपरिक होलिका दहन।

यह परंपरा गाँव के ऐतिहासिक सामाजिक ढाँचे और जागीरी व्यवस्था की जीवंत विरासत का प्रतीक मानी जाती है।

घाणेराव ठिकाने में विलय

1704 ई. में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन हुआ, जब घाणेराव के ठाकुर गोपीनाथ ने वरकाना को घाणेराव ठिकाने के प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण में सम्मिलित कर लिया।

इस प्रशासनिक पुनर्गठन से क्षेत्र की सुरक्षा अधिक सुदृढ़ हुई, बाहरी आक्रमणों से रक्षा व्यवस्था मजबूत हुई तथा राजस्व प्रशासन में स्थिरता आई। इसी काल में गोडवाड़ क्षेत्र का प्रशासन धीरे-धीरे मारवाड़ के राठौड़ शासन से अधिक निकटता से जुड़ने लगा, जबकि अरावली के पश्चिमी भागों पर मेवाड़ का प्रभाव क्रमशः कम होता गया।

स्वतंत्रता के बाद का काल

भारत की स्वतंत्रता (1947) के पश्चात राजस्थान के विभिन्न रियासती क्षेत्रों के एकीकरण के साथ पारंपरिक जागीरदारी व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम, 1952 के अंतर्गत जागीरों का विधिवत उन्मूलन किया गया।

वर्तमान में बरकाना (वरकाना) राजस्थान के पाली जिले का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक गाँव है। यहाँ स्थित वरकाना जैन मंदिर आज भी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए प्रमुख आस्था एवं तीर्थस्थल है। विभिन्न धार्मिक ट्रस्टों द्वारा इस धरोहर का संरक्षण एवं प्रबंधन किया जा रहा है, जिससे बरकाना की समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित बनी रहे।

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